सुंदरकांड (संपूर्ण पाठ हिंदी में)
सुंदरकांड — रामचरितमानस का पंचम सोपान
सुंदरकांड, गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस का पाँचवाँ सोपान है। इसमें हनुमान जी के समुद्र लांघने से लेकर लंका में सीता माता की खोज, अशोक वाटिका में उनसे भेंट, और लंका दहन तक की कथा वर्णित है।
यह प्रसंग हनुमान जी की भक्ति, साहस और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है, और इसे कठिन समय में पाठ करने की परंपरा रही है। नीचे संपूर्ण पाठ हिंदी में दिया गया है।
श्रीरामचरितमानस पञ्चम सोपान
सुन्दरकाण्ड
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम॥ १ ॥
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ २ ॥
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामाग्रगण्यम।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३ ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥१॥
यह कहि नाइ सबहिं कहँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥२॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥३॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एहि भाँति चलेउ हनुमाना॥४॥
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥१॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्ह आइ कही तेहिं बाता॥१॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कै सुधि प्रभुहि सुनावौं॥२॥
कवनेहँ जतन देउ नहिं जाना। ग्रसिस न मोहि कहेउ हनुमाना॥३॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥४॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥५॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥६॥
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥२॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥१॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपट कपि तुरतहिं चीन्हा॥२॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥३॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥४॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहि देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥५॥
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहुबिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बारूथिन्ह को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥१॥
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गजरहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहीं बहुबिधि एक एकन्ह तजरहीं॥२॥
कहँ मिहष मानुष धेनु खर अज अज गीत निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरिन्ह त्याग गति पैहिहं सही॥३॥
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पैसार॥३॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेस मोहि निंदरी॥१॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढरमनी॥२॥
जब रावनहि ब्रह्म कर दीन्हा। चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा॥३॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥४॥
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥४॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥१॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिर भगवाना॥२॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥३॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥४॥
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥५॥
मन महँ तरक करैं कपि लागा। तेहिं समय बिभीषनु जागा॥१॥
एहि सन हिठ करहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥२॥
निसि प्रबिसेषि राम मनु धरई। नामु जपत मंगल दिसि करई॥३॥
एहि सन ठिठि करब मैं कैसें। सज्जन सँग भवऊ सुभ दैसें॥४॥
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिर गुन ग्राम॥६॥
तात कबहँ मोहि जान अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥१॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता॥२॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥३॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥४॥
कीन्ही कृपा सुमिर गुन भरे बिलोचन नीर॥७॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्वाच्य बिश्रामा॥१॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥२॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्ह राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥३॥
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मो कहँ जलजाना॥१॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥२॥
कबहँ नयन मम सीतल ताता। होइहिहं निरखि स्याम मृद गाता॥३॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृद बचन बिनीता॥४॥
जिन जननी मानह जयँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम के दूना॥५॥
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥१४॥
नव तरु किसलय मनहँ कृसानू। कलिनसा सम निसि ससि भानू॥१॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥२॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥३॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥४॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥५॥
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥१५॥
राम बान रबि उएँ जानकी। तम बारूथ कहँ जातुधान की॥१॥
कछक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहिहं रघुबीरा॥२॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥३॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु व्याल॥१६॥
आसिष दीन्ह रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥१॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥२॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥३॥
सुनु सुत करिहं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥४॥
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥१७॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥१॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥२॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥३॥
आवत देखि बिटप गहि तारा। ताहि निपाति महाधुनि गारा॥४॥
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥१८॥
मारसि जिमि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥१॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्ज अरु धावा॥२॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मदरइ निज अंगा॥३॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥४॥
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥१९॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयउ। नागपास बाँधेसि लै गयउ॥१॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥२॥
दसमुख सभा दीख कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥३॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महँ गरुड़ असंका॥४॥
सुत बध सुरति कीन्ह पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥२०॥
की धौं ब्रन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥१॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया॥२॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥३॥
सब परिहरि रघुबीरहि भजु भजहिं जेहि संत॥३८॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥१॥
जन रंजन भंजन खल प्राता। वेद धरम रच्छक सुनु भाता॥२॥
देहु नाथ प्रभु कहँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥३॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥४॥
परिहरि मान मोह मद भजु कोसलाधीस॥३९ क॥
सीता देहु राम कहँ अहित न होइ तुम्हार॥३९ ख॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥१॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥२॥
अस कहि कीन्हे चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥३॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥४॥
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जिन खोरि॥४१॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥१॥
चलेउ हरष रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥२॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥३॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखहउँ तेई॥४॥
ते पद आजु बिलोकहउँ इन्ह नयनिन्ह अब जाइ॥४२॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जान कोउ रिपु दूत बिसेषा॥१॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥२॥
जान न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥३॥
सखा नीति तुम्ह नीक बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥४॥
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हान॥४३॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥१॥
जौं पै दृढ़हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥२॥
जौं पै दृढ़हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥३॥
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥१॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥२॥
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जदपि अखिल लोक कर राऊ॥३॥
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥४॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहँ। कृपासिंधु रघुनायक जहँ॥५॥
रिषि अगस्त कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥६॥
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥५७॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥१॥
क्रोधिह सम कामिह हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥२॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥३॥
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥५८॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥१॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥२॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उत्तरहि कटकु न मोरि बड़ाई॥३॥
जेहि बिधि उतरैं कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥५९॥
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तिरहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥१॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहँ गाइअ॥२॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रन धीरा॥३॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥४॥
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गाउअऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०॥
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
सुंदरकाण्ड समाप्त
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुंदरकांड में क्या कथा है?
सुंदरकांड में हनुमान जी के समुद्र पार करने, लंका में सीता माता को खोजने, उनसे भेंट करने, और लंका दहन की कथा वर्णित है। यह रामचरितमानस का पाँचवाँ सोपान है।
सुंदरकांड पाठ में कितना समय लगता है?
सामान्य गति से पूरा पाठ पढ़ने में लगभग 25 से 45 मिनट लग सकते हैं, यह पाठ की गति पर निर्भर करता है।
सुंदरकांड किसने लिखा है?
सुंदरकांड, गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का एक भाग है।
सुंदरकांड कब पढ़ा जाता है?
कई भक्त इसे मंगलवार और शनिवार को, या किसी विशेष प्रार्थना अथवा संकल्प के अवसर पर पढ़ते हैं, हालांकि इसे किसी भी दिन श्रद्धापूर्वक पढ़ा जा सकता है।
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